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माही वेलफेयर सोसाइटी

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लखनऊ विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि आज अलीगढ़ में आयोजित भारतीय किसान यूनियन (भानु) के सम्मेलन में पारित प्रस्ताव के माध्यम से उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की गई है कि किसानों और आम उपभोक्ताओं के व्यापक हित में पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण की चल रही प्रक्रिया को तत्काल निरस्त किया जाए।

विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदे और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का निर्णय तत्काल निरस्त हो —भारतीय किसान यूनियन सम्मेलन में उठा पुरजोर मुद्दा : किसानों का खुला समर्थन मिलने से बिजली कर्मियों का मनोबल बढ़ा

विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि आज अलीगढ़ में आयोजित भारतीय किसान यूनियन (भानु) के सम्मेलन में पारित प्रस्ताव के माध्यम से उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की गई है कि किसानों और आम उपभोक्ताओं के व्यापक हित में पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण की चल रही प्रक्रिया को तत्काल निरस्त किया जाए।

सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन और संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने निजीकरण और केंद्र सरकार द्वारा लाए गए इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 पर विस्तार से विचार रखे।

         भारतीय किसान यूनियन (भानु) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर भानु प्रताप सिंह ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्पष्ट घोषणा की कि बिजली के निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन में प्रदेश के किसान पूरी मजबूती के साथ बिजली कर्मियों के साथ खड़े हैं।

         ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि उत्तर प्रदेश में चल रही निजीकरण की प्रक्रिया को निरस्त किया जाना ही चाहिए, साथ ही केंद्र सरकार द्वारा लाया गया इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 भी वापस लिया जाए। उन्होंने कहा कि यह बिल पूरे ऊर्जा क्षेत्र के निजीकरण का दस्तावेज है, जिसका सीधा दुष्प्रभाव किसानों और आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

           उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल में सब्सिडी समाप्त करने और बिजली की पूरी लागत वसूलने का प्रावधान किया गया है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में बिजली की औसत लागत लगभग 8.18 रुपये प्रति यूनिट है, लेकिन निजीकरण के बाद निजी कंपनियों को न्यूनतम 16 प्रतिशत मुनाफे की गारंटी दी जाएगी, जिससे बिजली दरें बढ़कर कम से कम 10 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच जाएंगी।

       शैलेन्द्र दुबे ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई किसान 10 हॉर्स पावर का पंप प्रतिदिन 10 घंटे चलाता है, तो उसे प्रति माह लगभग 2250 यूनिट बिजली खपत पर करीब 22,500 रुपये का भुगतान करना पड़ेगा। स्पष्ट है कि निजीकरण का सबसे बड़ा आर्थिक आघात किसानों पर ही पड़ेगा।

        किसान यूनियन के सम्मेलन में स्मार्ट मीटर लगाए जाने के विरोध में भी प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव में कहा गया कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर वास्तव में निजीकरण को आसान बनाने के लिए लगाए जा रहे हैं।

         उन्होंने आरोप लगाया कि पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन द्वारा मनमाने ढंग से वर्टिकल सिस्टम लागू किए जाने से राजधानी लखनऊ सहित कई शहरों की बिजली व्यवस्था चरमरा गई है। अब स्मार्ट मीटरों के माध्यम से इन शहरों में फ्रेंचाइजीकरण की तैयारी की जा रही है।

         सम्मेलन में उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद अभियंता संघ के पूर्व अध्यक्ष वी पी सिंह को भारतीय किसान यूनियन (भानु) के विद्युत प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

         उल्लेखनीय है कि बिजली के निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के आज 454 दिन पूरे होने पर प्रदेशभर में सभी जनपदों एवं परियोजनाओं पर बिजली कर्मियों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन जारी रखा।

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