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माही वेलफेयर सोसाइटी

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विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने कहा है कि पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन द्वारा निजीकरण के उद्देश्य से कुछ शहरों में थोपी गई विद्युत वितरण की वर्टिकल व्यवस्था अब पूरी तरह विफल साबित हो रही है। संघर्ष समिति ने मनमाने ढंग से लागू की गई इस व्यवस्था को “पॉलिसी पैरालिसिस” करार देते हुए प्रबंधन से मांग की है कि वह अपनी असफलता स्वीकार करे और इस व्यवस्था को तत्काल समाप्त करे।

 विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश

के उद्देश्य से थोपी गई वर्टिकल व्यवस्था पूरी तरह विफल : टेक्निकल कार्य देख रहे  इंजीनियरों को राजस्व कार्य में लगाने से मेंटेनेंस प्रभावित होने की आशंका : गर्मियों में बिजली व्यवस्था लड़खड़ाने का खतरा


विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने कहा है कि पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन द्वारा निजीकरण के उद्देश्य से कुछ शहरों में थोपी गई विद्युत वितरण की वर्टिकल व्यवस्था अब पूरी तरह विफल साबित हो रही है। संघर्ष समिति ने मनमाने ढंग से लागू की गई इस व्यवस्था को “पॉलिसी पैरालिसिस” करार देते हुए प्रबंधन से मांग की है कि वह अपनी असफलता स्वीकार करे और इस व्यवस्था को तत्काल समाप्त करे।


संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि पहले से सुचारु रूप से चल रही विद्युत वितरण व्यवस्था को निजीकरण की दिशा में बदलने के लिए वर्टिकल व्यवस्था लागू की गई। इसके तहत बड़े पैमाने पर नियमित पद समाप्त किए गए और बड़ी संख्या में संविदा कर्मियों को कार्यमुक्त कर दिया गया, जिससे व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।


नई व्यवस्था के तहत 11 केवी और 33 केवी लाइनों तथा सबस्टेशनों के मेंटेनेंस का कार्य अलग कर दिया गया, जबकि राजस्व वसूली और कमर्शियल कार्य अलग तथा मीटरिंग का कार्य अलग कर दिया गया। इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह हुआ कि पहले जहां एक सहायक अभियंता 3–4 सबस्टेशन संभालता था, वहीं अब उसे 8–10 सबस्टेशन देखने पड़ रहे हैं। इसी प्रकार जूनियर इंजीनियरों पर भी कार्यभार कई गुना बढ़ गया है।


संघर्ष समिति ने कहा कि कमर्शियल और तकनीकी कार्यों को अलग करने के कारण राजस्व वसूली भी प्रभावित हो रही है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि मेरठ  में मार्च माह के दौरान 11 केवी और 33 केवी मेंटेनेंस कार्यों में लगे सहायक अभियंताओं और जूनियर इंजीनियरों को राजस्व वसूली के कार्य में लगा दिया गया है।


समिति ने चेतावनी दी कि यह निर्णय अत्यंत चिंताजनक है क्योंकि गर्मी का मौसम शुरू होने वाला है और इस समय 33 केवी सबस्टेशनों, ट्रांसफार्मरों और लाइनों का व्यापक मेंटेनेंस किया जाना अत्यंत आवश्यक होता है। यदि तकनीकी कार्य देख रहे अभियंताओं और कर्मचारियों को राजस्व वसूली में लगा दिया जाएगा तो मेंटेनेंस कार्य स्वाभाविक रूप से प्रभावित होगा, जिससे गर्मियों में बिजली आपूर्ति गंभीर रूप से बाधित हो सकती है और पूरी व्यवस्था पटरी से उतरने का खतरा पैदा हो सकता है।


संघर्ष समिति ने कहा कि बड़े पैमाने पर संविदा कर्मियों को हटाए जाने से पहले ही बिजली व्यवस्था प्रभावित हो चुकी है। जब पहले एक ही सहायक अभियंता राजस्व और मेंटेनेंस दोनों कार्यों को प्रभावी ढंग से संभाल रहा था, तब इस व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता ही क्या थी। अब तकनीकी कार्य देख रहे अभियंताओं को भी राजस्व सूची में लगाया जाना प्रबंधन की पूर्णतः असफल और दिशाहीन नीति को दर्शाता है।


संघर्ष समिति के आह्वान पर पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 472 दिन पूरे होने पर आज अवकाश के दिन बिजली कर्मचारियों ने जनसंपर्क अभियान चलाकर जनता को बताया कि निजीकरण से बिजली व्यवस्था और उपभोक्ताओं दोनों को भारी नुकसान होते 

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