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बज़्म-ए-ख़वातीन और ऑल इंडिया तालीम घर के तत्वावधान में प्रसिद्ध पत्रकार एवं साहित्यकार हयातुल्लाह अंसारी की 125वीं जयंती के अवसर पर आज फ़िरंगी महल चौक में एक सेमिनार और मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसमें वक्ताओं ने हयातुल्लाह अंसारी की साहित्यिक, पत्रकारिता और राजनीतिक सेवाओं को याद किया।

बज़्म-ए-ख़वातीन और ऑल इंडिया तालीम घर के तत्वावधान में प्रसिद्ध पत्रकार एवं साहित्यकार हयातुल्लाह अंसारी की 125वीं जयंती के अवसर पर आज फ़िरंगी महल चौक में एक सेमिनार और मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसमें वक्ताओं ने हयातुल्लाह अंसारी की साहित्यिक, पत्रकारिता और राजनीतिक सेवाओं को याद किया।

इस अवसर पर बज़्म-ए-ख़वातीन और ऑल इंडिया तालीम घर की अध्यक्ष बेगम शहनाज़ सिदरत ने मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों को एहज़ाज़-ए-बज़्म अवॉर्ड से सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन शहबाज़ तालिब ने किया।

इस मौके पर ज़ैनब सिद्दीकी ने ऑल इंडिया तालीम घर का तराना बेहद खूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया। अनवर जहाँ ने हयातुल्लाह अंसारी के जीवन एवं सेवाओं पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। विशिष्ट अतिथियों तथा सभी शायरों और शायराओं का गुलपोशी कर शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया।

बेगम शहनाज़ सिदरत ने कहा कि इंसान को ज़मीन की पस्तियों में रहकर भी आसमान जैसा ऊँचा बनना चाहिए। जो लोग इस विचारधारा पर अमल करते हैं, वही सफलता प्राप्त करते हैं। उन्होंने कहा कि आज शिक्षा का उद्देश्य बदल चुका है, जिसकी वजह से विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान नहीं कर रहे हैं। भौतिकवाद का प्रभाव बढ़ गया है, शिक्षक केवल वेतन के पीछे भाग रहे हैं और नैतिकता समाप्त होती जा रही है। उन्होंने कहा कि जीवन को स्वाभाविक रूप से देखना और जीना चाहिए।

मुख्य अतिथि डॉ. अकबर अली बिलग्रामी, असिस्टेंट प्रोफेसर, Maulana Azad University ने कहा कि उर्दू प्रेमी पूरे समर्पण के साथ उर्दू का दीप जलाए हुए हैं। हयातुल्लाह अंसारी ने भी यही कार्य किया, जिसकी रोशनी न केवल पूरे भारत बल्कि संपूर्ण उर्दू जगत तक पहुँची। उन्होंने यह भी शिकायत की कि तहज़ीब के शहर Lucknow ने हयातुल्लाह अंसारी के साथ बहुत बेरुख़ी बरती और उन्हें नज़रअंदाज़ किया।

परवेज़ मलिकज़ादा ने कहा कि हयातुल्लाह अंसारी ऐसे पत्रकार और साहित्यकार थे, जो राजनीति में रहकर भी निष्कलंक और पाक-साफ़ रहे। उनके साथ बैठकर बहुत कुछ सीखने को मिलता था। वे प्राचीन मूल्यों और आदर्शों के धनी थे। उनकी रचनाएँ उनके उज्ज्वल व्यक्तित्व और चरित्र की गवाह हैं।

बड़ी संख्या में उपस्थित श्रोताओं ने मुशायरे का भरपूर आनंद लिया। आमंत्रित शायरों के चुनिंदा अशआर को खूब सराहा गया।

फिर से बाजार में यूसुफ नहीं आने वाला अब जुलेखा तेरे बाजार की जीनत होगी Iqbal Yusuf 

सब अपने हादसों पर शेर कहना चाहते हैं। मैं शेर कहता था और हादसा बनाता था। अभीश्रेष्ठ तिवारी 

मेरे सुखन से महफिले यार भी मस्त थी। मैं चुप हुआ तो होश में दीवाने आ गए। मुईन अल्वी .

यूं ही सीने से लगाता नहीं कोई भी अयाज। खाक छानी है तो यह दशत हमारा हुआ है। डॉ अहमद अयाज। 

दिल मेरा जिससे बहलता कोई ऐसा ना मिला। बुत के बंदे मिले अल्लाह का बंदा ना मिला। शाहबाज तालिब 

मजदूरों के लहू से रोशन हैं सारे। जिन दियों से महलों की दिवाली है। Afzal Yusuf 

लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले। गुरुब होने का मतलब ज़वाल थोड़ी है। डॉ सुधा मिश्रा

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