अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत सरकार से मांग को लेकर पत्रकार बंधुओ से वार्तालाप
लखनऊ अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत एक गैर-सरकारी संगठन है, जो 53 वर्षों से उपभोक्ता जागरूकता, उपभोक्ता शिक्षण और उपभोक्ता मुद्दों पर मार्गदर्शन के क्षेत्र में कार्यरत है। ABGP देश के सभी राज्यों में 35000 से अधिक सदस्यों के साथ कार्य कर रहा है। ABGP समय समय पर ऐसे मुद्दे उठाता रहा है जो बड़े स्तर पर उपभोक्ताओं या पूरे समाज को प्रभावित करते हैं। ABGP अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) विषय पर
मई माह में पूरे देश में उपभोक्ता जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस विषय पर हम सक्रिय रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर कार्य कर रहे है (क) उत्पादन लगात का मुद्रण किया जाना चाहिए। (ख) फर्स्ट सेल प्राइस (जिस पर जी एस टी दिया है) को बताना चाहिए। (ग) भ्रमित करने वाले डिस्काउंट (छूट) पर प्रतिबंध लगाना चाहिए तथा उसकी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। (घ) MRP मुद्रण के लिए ऊपरी सीमा निर्धारित करने वाला कानून बनाना चाहिए। कानून में ये कहीं तय नहीं किया गया कि अधिकतम खुदरा मूल्य क्या हो सकता है, इसलिए वर्तमान में उत्पादक, फुटकर व थोक व्यापारी, एजेंट अपने अनुसार एम. आर. पी तय करते हैं। मेडिसिन क्षेत्र में हम सबका अनुभव यह है कि MRP उत्पादन लागत से 100 गुना से अधिक होता है। हम विज्ञापन देखते हैं जो दवाओं पर 80% तक की छूट देते हैं। कई मामलों में, उत्पादक को अस्पताल और अन्य एजेंसी उत्पादक को उनकी मर्जी के अनुसार MRP मुद्रित करने के लिए दबाव डालते हैं। 24 अप्रैल 2026 को 'द टेलीग्राफ' में प्रकाशित एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उद्योग निकाय व्यापार मार्जिन और MRP पर सीमा लगाने की मांग कर रहे हैं क्योंकि उत्पादक को अस्पताल और रिटेल विक्रेताओं के लिए मार्जिन बनाए रखने के लिए उनके अनुसार MRPप्रिन्ट करने के लिए मजबूर किया जाता हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में चिकित्सा उपकरणों की कीमत उत्पादन लागत से 25 गुना अधिक है। विशेष रूप से, ड्रेसिंग, बैंडेज और प्लास्टर के निर्माणकर्ता अपने उत्पादों की फैक्ट्री लागत के चार से पांच गुना तक MRP तय कर सकते हैं, लेकिन अस्पताल और खुदरा विक्रेता 10 से 20 गुना मूल्य वाली वस्तुओं को प्राथमिकता देते हैं। उदाहरण: (1) निर्माता के लिए रुपये की सई लगभग 32 रुपये में उचित व्यापार मार्जिन के साथ है. लेकिन इसका मूल्य टैग 30 रुपये होता है। बेची जा सकती (2) ₹25,000/- रुपये में आयात किए गए पेसमेकर की कीमत लगभग 75,000 रुपये हो सकती है, परंतु इसे 2 लाख रुपये में सूचीबद्ध किया जाता है। (3) देश में 4 लाख रुपये में लाया गया हृदय वाल्व 8 लाख रुपये में बेचा जा सकता है लेकिन इसका MRP 26 लाख रुपये हैं। (4) फैक्टी या आयात लागत 5 से 16 रुपये के बीच होने वाले स्टॉपकॉक 95 से 136 रुपये के रिटेल मूल्य टैग के साथ बेचे जाते हैं। (5) शॉपिंग मॉल में ब्रांडेड उत्पाद उच्च मूल्य के टेग के साथ उपलब्ध होते हैं। वहीं ब्रांडेड उत्पाद लगभग मॉल की कीमत के आधे दाम पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मिलते हैं। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता या तो मॉल में अधिक मूल्य देकर तुटे जाते हैं या ऑनलाइन खरीद में नकली या डुप्लीकेट वस्तुओं से धोखा खाते हैं। मूल समस्या यह है: 'MRP निर्माता-नियंत्रित है" MRP निर्माता तय करता है. बाज़ार या नियामक नहीं। व्यापारी मनमाने MRP से लाभान्वित हो रहे हैं और उपभोक्ता अपनी आय खो रहे हैं। MRP अस्पष्ट है और उपभोक्ता को इसकी संरचना की कोई जानकारी नहीं होती। कई बार उपभोक्ता ऐसे दाम चुकाता है जो उत्पाद के योग्यता से संबंधित नहीं होते। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत सरकार से मांग करती है कि (1) उपभोक्ताओं की खरीद पर MRP के प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए, भारत सरकार वित्त मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के माध्यम से ऐसा कानून बनाए, जो MRP को उपभोक्ताओं के लिए अधिक सार्थक और लाभकारी बनाए। (02) एक स्वतंत्र प्राधिकरण या बोर्ड या आयोग का गठन किया जाए, जिसके पास नियम तय करने आदेश जारी करने और अधिकतम खुदरा मूल्य के प्रतिकूल प्रभावों को समाप्त करने के अधिकार हो। (03) मौजूदा कानूनों में आवश्यक संशोधन किए जाएं ताकि कड़ाई से अनुपालन हो और उत्तंधन पर कड़ी सजा दी जाए। धन्यवाद प्रेस वार्ता कर्ता - डॉ प्रमोद पांडेय राष्ट्रीय पर्यावरण आयाम प्रमुख अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत सहयोगी वक्ता प्रांतीय अध्यक्ष यशपाल सिंह , प्रांतीय उपाध्यक्ष ओमकार पाण्डेय प्रांतीय संगठन मंत्री डॉ राम प्रताप सिंह बिसेन प्रांतीय सचिव आशुतोष मिश्रा कोषाध्यक्ष रमा शंकर अवस्थी , प्रचारआयाम प्रमुख विश्वनाथ मिश्रा


0 Comments