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​लखनऊ। एक सभ्य समाज की पहचान उसके तार्किक दृष्टिकोण से होती है, किंतु जब यही समाज अंधविश्वास के कुहासे में लिपट जाए, तो कला का धर्म उसे आईना दिखाना हो जाता है। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के

अंधविश्वास की बेड़ियों को तोड़ता 'भूसा': रंगयात्रा ने पेश की सामाजिक विसंगतियों पर एक बेबाक प्रस्तुति

​रिपोर्ट: अजय सिंह


​लखनऊ। एक सभ्य समाज की पहचान उसके तार्किक दृष्टिकोण से होती है, किंतु जब यही समाज अंधविश्वास के कुहासे में लिपट जाए, तो कला का धर्म उसे आईना दिखाना हो जाता है। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के प्रांगण में 'रंगयात्रा, लखनऊ' द्वारा मंचित नाटक 'भूसा' ने इसी वैचारिक संघर्ष को बेहद सशक्त और मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया। डॉ. हरिओम की कहानी पर आधारित यह नाटक, समाज की उन जड़ों को झकझोरने वाला साबित हुआ, जहाँ तर्क का स्थान अंधविश्वास ने ले रखा है।

​उद्घाटन और वैचारिक गरिमा

​कार्यक्रम का शुभारंभ साहित्य और प्रशासनिक जगत के मर्मज्ञ, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पार्थसारथी सेन शर्मा के कर-कमलों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। अपने संबोधन में उन्होंने कला के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करने की इस पहल को एक अनिवार्य आवश्यकता करार दिया।

​इस वैचारिक संध्या की शोभा बढ़ाने के लिए भारतीय संविधान सम्मान समिति की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं बौद्ध मति विमला देवी एक सजग और जिज्ञासु दर्शक की भूमिका में उपस्थित रहीं। पूरी नाट्य प्रस्तुति के दौरान उनकी एकाग्रता यह दर्शा रही थी कि विषय का सामाजिक सरोकार उन्हें कितना प्रभावित कर रहा है। कार्यक्रम के उपरांत उन्होंने नाटक के संदेश को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का आह्वान किया और कलाकारों के प्रयास की सराहना की।

​कलात्मक निर्देशन और कथा का मर्म

​नाटक का नाट्य रूपांतरण, परिकल्पना और निर्देशन प्रख्यात रंगकर्मी ज्ञानेश्वर मिश्र 'ज्ञानी' ने किया है। उन्होंने डॉ. हरिओम की मूल कहानी के कथानक को मंच पर इतनी बारीकी से पिरोया कि वह किसी कहानी का मंचन न होकर एक जीवंत यथार्थ प्रतीत होने लगा। उनके निर्देशन की सार्थकता इस बात में दिखी कि उन्होंने जटिल सामाजिक मुद्दों को अत्यंत सरल और हृदयस्पर्शी भाषा में दर्शकों के समक्ष रखा।

​अभिनय का सशक्त पक्ष

​मंच पर कलाकारों की जुगलबंदी ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कोमल प्रजापति, योगेंद्र पाल और अभय सिंह रावत सहित पूरी टीम ने अपने अभिनय में परिपक्वता का परिचय दिया। पात्रों की द्वंद्वात्मक स्थिति, उनका संघर्ष और अंधविश्वास के प्रति उनका समर्पण—सब कुछ कलाकारों ने अपनी संवाद अदायगी और भाव-भंगिमाओं से जीवंत कर दिया। विशेषकर कोमल प्रजापति की भावपूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों के दिलों को छू लिया।

​संस्कृति मंत्रालय का सहयोग और सार्थकता

​संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार एवं उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के सहयोग से संपन्न यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। नाटक का शीर्षक 'भूसा' स्वयं में एक तीखा व्यंग्य है—जिस प्रकार भूसा अनाज के सार को ढंक लेता है, उसी प्रकार अंधविश्वास मानवीय तर्कशक्ति को ढक कर उसे खोखला बना देता है। यह नाटक दर्शकों को उस 'भूसे' को झाड़कर विवेक के प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है।

​निष्कर्ष

​'भूसा' का यह मंचन लखनऊ के रंगमंच की समृद्ध परंपरा और सामाजिक प्रतिबद्धता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। विमला देवी जैसी प्रबुद्ध हस्तियों की उपस्थिति और दर्शकों की भारी भागीदारी ने इस आयोजन को एक वैचारिक आंदोलन का स्वरूप दे दिया। निश्चित रूप से, यह प्रस्तुति न केवल नाटक प्रेमियों के लिए एक सुखद अनुभव थी, बल्कि समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध एक वैचारिक क्रांति का शंखनाद भी थी।

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