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विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने मांग की है कि उत्तर प्रदेश के आगरा तथा ग्रेटर नोएडा में विद्युत वितरण कार्य कर रही निजी कंपनियों का भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा व्यापक ऑडिट कराया

 विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश

पावर सेक्टर में कार्यरत निजी कंपनियों का सीएजी ऑडिट कराया जाए : दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय का उत्तर प्रदेश में भी अनुपालन हो : आगरा एवं ग्रेटर नोएडा की निजी बिजली कंपनियों की वित्तीय  जांच आवश्यक – संघर्ष समिति*


विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने मांग की है कि उत्तर प्रदेश के आगरा तथा ग्रेटर नोएडा में विद्युत वितरण कार्य कर रही निजी कंपनियों का भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा व्यापक ऑडिट कराया जाए, ताकि उनके आय-व्यय, लाभ-हानि, सरकारी रियायतों तथा उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ की वास्तविक स्थिति सामने आ सके। संघर्ष समिति का कहना है कि सार्वजनिक हित से जुड़े विद्युत क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सीएजी ऑडिट अत्यंत आवश्यक है।


संघर्ष समिति ने कहा कि हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली में कार्यरत निजी बिजली वितरण कंपनियों (बीएसईएस डिस्कॉम) के सीएजी ऑडिट का मार्ग प्रशस्त करते हुए स्पष्ट किया है कि निजी कंपनियों द्वारा सीएजी ऑडिट का विरोध उचित नहीं है। न्यायालय ने माना कि बिजली वितरण जैसी सार्वजनिक सेवा का सीधा प्रभाव करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ता है, इसलिए उसकी वित्तीय जांच सार्वजनिक हित में आवश्यक है। उत्तर प्रदेश में भी इसी सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए।


संघर्ष समिति ने आगरा का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 2025-26 में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन ने टोरेंट पावर को लगभग 2400 मिलियन यूनिट बिजली की आपूर्ति ₹4.55 प्रति यूनिट की दर से की, जबकि उसी अवधि में पावर कॉरपोरेशन की औसत बिजली खरीद लागत लगभग ₹5.85 प्रति यूनिट रही। अर्थात कॉरपोरेशन ने अपनी लागत से लगभग ₹1.30 प्रति यूनिट कम दर पर बिजली उपलब्ध कराई, जिससे केवल एक वर्ष में ही लगभग ₹312 करोड़ का वित्तीय नुकसान हुआ।


संघर्ष समिति ने कहा कि पिछले 16 वर्षों से आगरा अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी व्यवस्था के अंतर्गत पावर कॉरपोरेशन अपनी खरीद लागत से कम दर पर निजी कंपनी को बिजली उपलब्ध करा रहा है, जिसके कारण सार्वजनिक क्षेत्र को हजारों करोड़ रुपये की क्षति हुई है। यह अत्यंत गंभीर विषय है कि घाटे का बोझ प्रदेश के आम उपभोक्ताओं और पावर कॉरपोरेशन पर डाला जा रहा है, जबकि निजी कंपनी लगातार लाभ अर्जित कर रही है। संघर्ष समिति ने प्रश्न किया कि क्या यही निजीकरण का मॉडल है?


संघर्ष समिति ने मांग की कि आगरा अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी समझौते की तत्काल पुनर्समीक्षा कराई जाए तथा यदि जांच में अनियमितताएं और सार्वजनिक हित के विरुद्ध शर्तें पाई जाती हैं तो इस घाटे वाले करार को निरस्त किया जाए। सीएजी ऑडिट से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच संभव होगी और वास्तविक वित्तीय स्थिति उजागर होगी।


संघर्ष समिति ने यह भी कहा कि ग्रेटर नोएडा में कार्यरत निजी बिजली कंपनी का भी सीएजी ऑडिट कराया जाना चाहिए। कंपनी ने करार के अनुसार विद्युत उत्पादन संयंत्र स्थापित करने का दायित्व लिया था, किंतु आज तक उसका पालन नहीं किया गया। इस सहित सभी संविदात्मक दायित्वों, वित्तीय लेन-देन तथा उपभोक्ताओं के हितों की सीएजी द्वारा जांच कराई जानी चाहिए, जिससे किसी भी प्रकार की अनियमितता और सार्वजनिक धन की हानि का खुलासा हो सके।


संघर्ष समिति ने कहा कि सीएजी ऑडिट के निष्कर्षों के आधार पर सरकार के पास निजी कंपनियों के साथ हुए समझौतों की समीक्षा करने तथा आवश्यक होने पर उन्हें निरस्त करने के पर्याप्त वैधानिक और तथ्यात्मक आधार उपलब्ध होंगे। सार्वजनिक धन और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए यह कदम अत्यंत आवश्यक है।


शैलेन्द्र दुबे

संयोजक

 9415006225

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